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अहमियत

  • rajaramdsingh
  • Mar 21, 2022
  • 5 min read

Updated: Jul 31, 2022

वर्तमान परिपेक्ष्य के हालात की चीख चीख कर बायां करती यह कहानी आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूं जो सच्चाई के बिल्कुल करीब है । आशा है इसे आप अवश्य पढ़ेंगे और अपनी प्रतिक्रिया देकर मुझे गौरवान्वित करेंगे । यह कहानी आपको दुनियां की सच्चाई से अवगत कराएगा , हमारी वजूद को बताएगा जिसे पढ़ आप अपने आपको पहचानने लगेंगे , क्या मेरा और क्या तेरा करने पर विचार करेंगे । तो आइए चलते हैं अपने कहानी की ओर ....

हमारे एक मित्र हैं जो किसी कॉलेज से अभी अभी रिटायर हुए हैं , नाम है मंद कुमार । देखने सुनने में किसी राजकुमार से कम नहीं । ईमानदारी इतना कि कुछ भी लाए तो परिवार के सभी सदस्यों को बराबर बराबर बांट कर देना अपना उत्तरदायित्व समझते । दोनों बेटा में से कोई भी नौकरी नहीं करता , अपने पिता के पेंशन पर ही ऐश करता है । मंद कुमार ने सभी बच्चों का इंसुरेंस तथा मेडिक्लेम करा रखा है । किसी को कुछ भी हो तुरंत वह उसे शहर के नामी गामी हॉस्पिटल में एडमिट कर उसका इलाज करावाते , खुद कष्ट सहकार भी अपने परिवार पर सब कुछ लुटाते ।

बुढ़ापे में भी अपने खान पान और स्वस्थ का ध्यान देना उनकी प्राथमिकता थी । रिटायरमेंट के बाद उन्होंने एक गाय खरीदी है जिसकी सेवा करना तथा उसके दूध और घी का भरपूर उपयोग अपने परिवार में करना उनके जीवन का लक्ष्य था । दो बेटा भी है इनका जिसमें बड़े बेटे की एक 16 साल की बेटी और एक बेटा है तथा छोटे बेटे से भी इन्हें दो पोता है । रिटायरमेंट के बाद अपने सारे पैसे दोनों बेटा में बराबर बराबर बांट कर अपने परिवार के सदस्यों पर सर्वस्व लुटाने को तैयार रहते ।

आज एकाएक इन्हें बुखार का कुछ एहसास हुआ । गांव के एक डॉक्टर को बुलाए जिन्होंने कोरोना होने का शक जाहिर किया क्योंकि वे सारे लक्षण दिखायी दे रहे थे जो एक कोरोना पॉजीटिव मरीज के अंदर दिखाई देते हैं।

परिवार के सदस्यों के चेहरों पर खौफ़ का मंज़र स्पष्ट दिखाई देने लगा गया । उनकी चारपाई घर के बाहर गाय के बथान में एक पुराने खोपड़ी में डाल दी गई जहां से दोनों बेटों और बहुओं ने अब इनसे दूरी बना ली और बच्चों को भी पास ना जानें के निर्देश दे दिए गये । छोटे बेटे ने सरकार द्वारा जारी किये गये नंबर पर फोन कर के अस्पताल में सूचना दे दी । देखते देखते खबर पूरे गांव में फैल गई । मंद कुमार कितने हीं लोगों के वक़्त बेवक्त काम आते थे , किसी की बेटी की शादी में मदद तो किसी के दुख दर्द में साथ निभाते थे । बरसात हो या कड़ाके की ठंडी , सूचना मिलते ही वह उसके मदद के लिए सब कुछ छोड़ कर उसकी सेवा में हाजिर हो जाते थे परन्तु आज जब मंद जी को कोरोना के लक्षण की खबर का पता चला , कोई मिलने क्या देखने भी नहीं आया।

बगल वाली बुढ़िया काकी साड़ी के पल्लू से मुँह लपेटे हुए, हाथ में छड़ी लिये आई और मंद कुमार की बड़ी बहू से बोली - "अरे नजदीक नहीं जाओगे कोई बात नहीं, कम से कम दूर से खाना तो इसे दे दो । न जाने अस्पताल में इसे कब खाना देगा ।" अब प्रश्न ये था कि उनको खाना देने के लिये कौन जाए ? बहुओं ने खाना अपनी सास को पकड़ा दियाl।अब मंद की पत्नी के हाथ भी थाली पकड़ते ही काँपने लगे और पैर तो मानो ज़मीन में हीं गड़ गए ।

यह देखकर बुढ़िया काकी बोली- "अरी तेरा तो पति है ! मुँह बाँध के चली जा और थोड़ी दूरी पर थाली रख देना , वो अपने आप उठाकर खा लेगा। " ये सारी बातें मंद जी चुपचाप सुन रहे थे, उनकी आँखें नम थी और काँपते होठों से उन्होंने कहा कि-"किसी को भी हमारे पास आने की जरूरत नहीं , मुझे बिल्कुल भूख नहीं है ।"

थोड़ी देर में सायरन बजाते हुए एम्बुलेंस आ जाती है । मंद जी को एम्बुलेंस में बैठने के लिये बोला जाता है। मंद जी झोपडी के बाहर आकर एक बार नजर उठाकर देखते हैं। पोती -पोते और घर वाले अलग खड़ा अपना अपना मास्क पहन बुज़ुर्ग मंद को निहारते रहे । बुखार से तलमालाते हुए एम्बुलेंस की ओर बढ़े । मंद को बच्चों के पीछे सर पर पल्लू रखे उनकी दोनों बहुएँ , बेटा तथा उन्हीं के बगल में पत्नी भी दिखाई दी जिन्होंने सुख दुख में साथ जीने मरने की कसम खाई थी लेकिन इस बुज़ुर्ग को एम्बुलेंस में बिठाने कोई भी आगे तक नहीं आया ।

विचारों का तूफान बुज़ुर्ग मंद जी के अंदर हिलोरे मार रहा था । उनकी पोती ने उनकी तरफ हाथ हिलाते हुए टाटा एवं बाई बाई कहा। एक क्षण को उन्हें लगा कि 'जिंदगी ने अलविदा कह दिया तथा यह देख उनकी आंखें डबडबा गई ।उन्होंने झुककर उस झोपडी की दहलीज को चूमा , गौमाता को प्रणाम किया और ढाढस बांध नम आंख लिए एम्बुलेंस में जाकर बैठ गया ।मंद ने एम्बुलेंस में से देखा उनकी पत्नी ने तुरंत पानी से भरी बाल्टी झोपडी की उस दहलीज पर उझल दी, जिसको मंद नमन कर एम्बुलेंस में बैथा था ।

इसे तिरस्कार कहो या गॉड प्लान , लेकिन ये दृश्य देखकर गौ माता भी रो पड़ी और जितनी दूरी तक एम्बुलेंस दिखा एकटक निगाहों से देखती रही तथा मंद की याद में जोर जोर से आवाज़ करती रही ।

जिस बेड पर मंद को हॉस्पिटल में रखा गया उसके बगल वाले बेड पर पांच घंटे से डेड बॉडी पड़ा था । आज जिंदगी की सच्चाई सामने थी । जीवन का मूल्य स्पष्ट दिखाई दे रहा था । उसकी सभी जांच की गई । पता चला कि वे कोरोना पॉजिटिव नहीं बल्कि वायरल बुखार से पीड़ित हैं । उनका इलाज हुआ और 14 दिन के बाद उन्हें पूर्णतः स्वस्थ घोषित करके छुट्टी दे दी गयी।

जब वह अस्पताल से बाहर निकला तो उनका कोई परिजन नजर नहीं आया जबकि डॉक्टर ने उनके परिजन को इसकी सूचना पहले हीं दे दी थी । परिजन के अभाव में डॉक्टर ने मंद को घर जाने के लिए एम्बुलेंस की व्यवस्था कर दी तथा उसमें बैठकर अपने घर जाने को कहा जिसे मंदने आदरपूर्वक मना कर दिया तथा अपने दवा की थैली लिए अज्ञात दिशा में चल दिया जिसका किसी को कोई पता नहीं ।

जब उनका बेटा उन्हें लेने आया तो पता चला वे यहां से घंटों पहले जा चुके हैं । डॉक्टरों द्वारा पूछे जाने पर कि जब आपको समय बता दिया गया था तो भी आपने देरी क्यों की ? दोनों बेटों ने एक साथ जवाब जबाव दिया हम लोग अपने अपने बीबी बच्चों को छोड़ने अपने ससुराल गए हुए थे ।

आज मंदजी के फोटो के साथ उनकी गुमशुदगी की खबर छपी है और लिखा है मेरे भगवान तुल्य पिता जी की सूचना देने वाले को उचित ईनाम दिया जायेग और उनका पेंशन उनकी पत्नी यानि मां को कैसे मिले इसलिए दौड़ भाग शुरू कर दी है । जब भी कहीं से आते हैं बड़े आदर भाव से पिताजी के फोटो को नमन करते हैं परन्तु कोरोना ने सारे रिश्ते को दाव पर लगा दिया था ।

अंत में कहूंगा कोरोना ने सचमुच यह साबित कर दिया कि आदमी की क्या अहमियत है । कोरोना पेसेंट से दूरी रखना जरूरी है परन्तु इतना भी नहीं कि पूरी ज़िन्दगी उस वियोग में पछताना पड़े ।

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