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कभी अपना समझती थी

  • rajaramdsingh
  • Mar 26, 2022
  • 1 min read

Updated: Mar 28, 2022

कभी अपना समझती थी ,हमें अपना तू कहती थी,

मेरे दुःख दर्द के खातिर ,ज़माने भर से लड़ती थी ।

मगर ऐसा हुआ है क्या , कि हमसे रूठ कर बैठी ,

न मेरा फोन लेती हो , न कोई फोन करती हो ।।


तुम मेरे हीं किताबों कि , एक खुली कहानी है ,

नहीं होता चैनों अमन , बढती हरपल हैरानी है।

बढ़ाओ एक कदम तू भी , एक हम भी बढ़ाएंगे ,

तू एक मिस कॉल कर देना ,तुम्हें हम फोन कर लेंगे।।


तू हमको हीं नहीं खाली , तू भारत देश छोड़ी हो ,

विदेशों में तू जा करके, बनी बिलायती गोरी हो।

तू पैसों के खातिर हीं , अपनों को छोड़ बैठी हो ,

न कोई चिट्ठी देती हो , न कोई मेल करती हो ।।


जब बंध गए बंधन , तो नाता तोड़ नहीं सकता ,

जब बाँध दी राखी , तो फिर मुंह मोड़ नहीं सकता ।

पैसे हैं बहुत कुछ पर , सब कुछ हो नहीं सकता,

ये नाता भाई बहन का है , जिसे कोई तोड़ नहीं सकता।।


कभी अपना समझती थी ,हमें अपना तू कहती थी,

मेरे दुःख दर्द के खातिर ,ज़माने भर से लड़ती थी ।

मगर ऐसा हुआ है क्या , कि हमसे रूठ कर बैठी ,

न मेरा फोन लेती हो , न कोई फोन करती हो ।।


 
 
 

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