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खूब ख़िलाखिलायेंगे

  • rajaramdsingh
  • Mar 21, 2022
  • 1 min read

काम धंधों का काम तमाम , दूरियां बढ़ा दी सर्दी जुकाम । लोग परेशान हैं बंद घरों में , बाहर जाने पर लगा लगाम ।।

अपने भी अपनों से दूर हो गए , एकांतवास को मजबूर हो गए । मांगलिक कार्यक्रम में जुटने के , सारे सपने चूर चुर हो गए ।।

पूरे विश्व में बयार बह गई , लाशों की कतार लग गई । वक़्त ने ढाया ऐसा सितम , दूरियां हीं जैसे यार बन गई ।।

जो भी सही सलामत बचेगा , धीरज धर जो आफत सहेगा । भले गुजारेगा कष्टमय जीवन , नहीं किसी से नफरत करेगा ।।

अपने हीं घरों में बंद रहना , अपनों से भी यही कहना । है हालात की मज़बूरी , बैरी बयार है बैठकर सहना ।।

अभी भी अगर नहीं संभलेगा , बाहर निकल अगर टहलेगा । बिखर जाएंगे पतझड़ जैसे , जिसे देखकर दिल दहलेगा ।।

यह प्रकृति का छेड़ा जंग है , महामारी रूपी मृदंग है । जो सिर्फ मुझे या तुझे नहीं , पूरे विश्व को किया तंग है ।।

आपको अपने लिए नहीं जीना , बल्कि अपनों के लिए है जीना । महामारी के इस जहर को , घर में कैद हो घूंट घूँट पीना ।।

रहे सुरक्षित तो गले लगाएंगे , एक दूजे से हाथ भी मिलाएंगे । दूरियां अगर बनाये रखें तो एक दिन खूब ख़िलखिलायेंगे ।।

 
 
 

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