जब तेरी चिट्ठी मिली
- rajaramdsingh
- Apr 14, 2022
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जब तेरी चिट्ठी मिली , ख़ुशी से झूम गया मैं ,
ड्रावर में रखकर उसे ,ताला लगा दिया मैं ।
इच्छा थी उसे तुरत , खोलकर पढ़ने की ,
देख लोगों की भीड़ मन मसोर लिया मैं ।।
कारण ऑफिस में , देर से था आया ,
अर्जेन्ट थे कई काम ,उसे भी निपटाया ।
सामने खड़े थे , जिनका काम था ज़रूरी ,
फ़टाफ़ट किया बात, और उन्हें भी पटाया ।।
खैर कोई बात नहीं , सब को हटाया ,
फोन लगातार बज रहे थे ,उन्हें भी समझाया ।
खाली हुआ जबतक, लंचटाइम हो गया था ,
संयोगवश खाने का ,डब्बा भी नहीं था लाया ।।
अब खाली हो ज्योंही मैं, बैठा अपने कुर्सी पर ,
न जाने कब मेरा हाथ, चला गया था चिट्ठी पर ।
ऊपर गोल्डन राइटिंग में ,लिखा था मेरा नाम ,
कंप्यूटर प्रिंट भी झुककर, करता था सलाम ।।
चूमा उसे कई वार ,पढ़ा समझ समझकर ,
चिट्ठी में थी भेजी , मिठास भर भरकर ।
था मान और सम्मान, छूटा हुआ सामान ,
संग संग होली खेलने का, दिल में अरमान ।।
कोशिश करूंगा मैं ,अगले होली में आने की ,
रंग और गुलाल से ,चहरे को सजाने की ।
फिलहाल करना माफ़ हमें, है समय अभाव ,
प्रतीक्षा करना चहरे पर ,रंगों को लगाने की ।।
थोड़ी इंतज़ार करो, खेलने की होली ,
अगले बरस आएंगे ,लेकर अपनी टोली ।
अगर जी चाहे , कर लेना मोबाइल हमें ,
होली का मुबारकबाद, देता हूँ मैं तुम्हें।।
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