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जीवन की परिभाषा

  • rajaramdsingh
  • Mar 30, 2022
  • 1 min read

Updated: Apr 13, 2022

जीवन के बारे में क्या कहूँ ,

अजीब है इसकी भाषा ।

है इसके अनेकों रूप ,

विचित्र इसकी परिभाषा ।।


कोई अपनो के साथ

रहने को ताउम्र तरसता ।

तो कोई जान बुझकर

संतान से अलग ही रहता ।।


कोई अपने जायदाद की ,

रखवाली में रहता लीन ।

किसी को पसंद शहर तो ,

किसी को गांव की जमीन ।।


कभी देता गरीबी दारुण दुख ,

कभी अमीरी से रहते बेमुख ।

कभी बीबी बच्चों का झमेला ,

तो कभी संतो की ओर रुख ।।


जीवन में अपना पराया ,

नहीं कुछ भी है होता ।

अंत समय में सिर्फ आपका ,

कर्म ही साथ देता ।।

आशा का नाम है जीवन ,

जहां सब कुछ होता पावन ।

सांसें जब तक चलती है ,

तब तक ही है वह जीवन ।।


कहे राजाराम समझदारों से ,

अकेला जीवन भी है अलबेला ।

ना समझे तो सबके होने पर भी ,

पर जाता है मनुष्य अकेला ।।

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