पैसातंत्र
- rajaramdsingh
- Mar 20, 2022
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था कभी जो जीता ही नहीं , मदिरा कभी पीता ही नहीं । नहीं परदेशी, है वह देशी , जो हार कभी सकता ही नहीं ।।
तंत्र पैरवी पैसों के बदौलत , जो बढ़ाता अपना शोहरत । दुश्मन है वह प्रजातंत्र का , लूटने खजाना मांगे मोहलत ।।
विवाह बारात में हो व्यवधान , सड़क सुविधा से भी परेशान । चंद पैसों के खातिर फिर भी , बेच रहा अपना ईमान ।।
कुछ होते अफवाह माफिया , सच पर डालते झूठी डोरियां । सांप बन जो डसे समाज को , भरते पैसों से अपनी बोरियां ।।
कभी यहाँ था राजतंत्र , दे बलिदान बना प्रजातंत्र । दिख रहा है देश खतरे में , बन रहा यह पैसा तंत्र ।।
उठो जागो हे भारत वासी ,
प्रजातंत्र को लग रहा है फांसी ।
मुट्ठी भर लोगों के खातिर ।
आज़ाद हिंद बन गया है दासी ।।
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