फूल और भँवरे
- rajaramdsingh
- Apr 14, 2022
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चाँदनी रात थी , नदी का किनारा ,
झड़ने से पानी का , गिरता फुहारा ।
मोगरा की खुशबू से , चमन महका था ,
अम्बर में बिजली संग,बादल गरजा था ।
चल रहे थे मंद मंद , झोंके हवा के ,
फूल गले मिलकर, दुआ कर रहे थे ।।
सुनहरा पल था वह,मिला जब किनारा ,
कैसे बयां करूँ मैं , कौन है सहारा ।
चाँदनी रात थी ,नदी का किनारा ,
झड़ने से पानी का , गिरता फुहारा ।।
मोगरा चमेली चम्पा ,खुशबू बिखेरती ,
दरिया दिल है दामन ,सबको समेटती ।
गुनगुना के भवरे, सबको रिझा रहे ,
फूल कली मिलकर ,गाने गुन गुना रहे ।।
किसको पता है जग में, कौन सहारा ,
कौन मझधार में, कौन है किनारा ।
चाँदनी रात थी, नदी का किनारा ,
झड़ने से पानी का गिरता फुहारा ।।
ठंढी चली हवा थी ,बादल गरजे थे ,
भँवरे फूल कली को चुम भी रहे थे ।
एक कली जो ,नहीं थी बनी फूल ,
वह चला रही थी ,खुशबू का शूल ।।
देते हैं जिसको , वह देता सहारा ,
एक ही लगाता है , सबको किनारा ।
चाँदनी रात थी , नदी का किनारा ,
झड़ने से पानी का , गिरता फुहारा ।।
फूल के आगोश में , भँवरे सिमट गए ,
नरम पंखुड़ी से जाकर ,जैसे लिपट गए ।
रसपान मादकता का, करके था निकला ,
मदहोशियों में वह , मानो जैसे पिछला ।।
दुनिया की रीति है , प्रीत का सहारा ,
लेकिन अति हुआ तो , है नहीं किनारा ।
चाँदनी रात थी , नदी का किनारा ,
झड़ने से पानी का , गिरता फुहारा ।।
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