मैं भी कभी शेर था
- rajaramdsingh
- Mar 20, 2022
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Updated: Feb 17, 2023
आईये कुछ गुदगुदाता हूँ , राई के पेड़ से पर्बत दबाता हुँ । चटपटे अटपटे सुनी सुनाई एक रोचक कहानी सुनाता हूँ ।।
मेरे पड़ोस में एक शादी थी , जुटी जिसमें बड़ी आबादी थी । बैंड की धुन पर थिरकने वाले , युवक युवती और दादी थी ।।
हुआ जब बैंड बजना बन्द , तब खड़े थे वहां लोग चंद । म्यूजिक के बन्द होने पर भी , थिरक रहा था एक अक्लमंद ।।
व्यंग कसा क्योंकि था वह मगन , ऐसे नाच रहा जैसे वही हों सजन । बोला वह क्यों न नाचूँ दोस्त , आज है मेरे भाई का है लगन।।
यह सुनते हीं मच गई खलबली , कहां राजा भोज कहां गंगु तेली । उड़ गए सबके होश ऐसे जैसे , छुछुन्दर के सिर गमके चमेली ।।
बोला यह है जंगल का राजा शेर , तुम हो लगाने वाले मिट्टी के ढेर । फिर कैसे हो तुम इसके भाई , कहां ऊंची बांध कहां छोटी मेड ।।
सुनते हीं ठहाके में हुई नहीं देर ,
सबने मनाई खुशियां देर सबेर ।
चूहे ने कहा हंस लो कुंवारे हो ,
शादी के पहले हम भी थे शेर ।।
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