शिक्षक दिवस
- rajaramdsingh
- Mar 26, 2022
- 3 min read
Updated: Jul 21, 2024
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु , गुरुर्देवो महेश्वराः I
गुरुर्साक्षात परम्ब्रह्मै , तस्मै श्रीगुरुवे नमः II
मेरे मन मंदिर में बसने वाले परम गरिमामय गुरुदेव , आदरणीय अभिभावकगण एवं श्रद्धेय साथियों ,
आपके आँखों के पाँखों में पुलक के समीर लगे I
हे मेरे चांद चर्चित चंद्रिके ! आज ५ सितम्बर है यानि शिक्षक दिवस !!! डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी का जन्मदिन I डॉ कृष्णन हमारे देश के प्रथम उपराष्ट्रपति , द्वितीय राष्ट्रपति , एक महान विभूति , शिक्षाविद , दार्शनिक एवं आशावान विचारक थे I उनके व्यक्तित्व का इतना असर था कि १९५२ में उनके लिए संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति का सृजन किया गया I
डॉ राधाकृष्णन जी १९५२ में जब राष्ट्रपति बने तो तब उनके प्रशंसकों ने उनसे निवेदन किया कि वे उनका जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाना चाहते हैं I यह सुनते हीं उनहोंने कहा " मेरे जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने से समग्र शिक्षकों का सम्मान होगा और मैं अपने आपको गौरवान्वित महशुश करूंगा " और तभी से ५ सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा |
डॉ कृष्णन ज्ञान के गंगा थे I उनके हाजिर जबाबी का एक किस्सा आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूँ I एक वार किसी प्रीतिभोज के सुअवसर पर अंग्रेजों के तारीफ़ के पुल बांधते हुए एक वरिष्ठ अंग्रेज ने कहा " ईश्वर हम अंग्रेजों को बहुत प्यार करते हैं I उनहोंने हम अंग्रेजों को बड़े यत्न और स्नेह से बनाया है , इसीलिए हमलोग इतने गोड़े और सुन्दर हैं " i उस सभा में संयोग से डॉ कृष्णन भी उपस्थित थे i जब उनकी बारी आई तो उनहोंने वहाँ उपस्थित लोगों को सम्बोधित करते हुए बोला " मित्रों , एक वार भगवान को रोटी बनाने का मन हुआ i उनहोंने जो पहली रोटी बनाई वह पूरा पका नहीं , अधपका रह गया , परिणाम स्वरुप अंग्रेजों का जन्म हुआ i दूसरी रोटी कच्ची नहीं रहे इसलिए उसे ज्यादा देर तक सेका जिससे वह जल गई - नतीजतन नीग्रो पैदा हुए मगर तीसरी वार रोटी बनाने में भगवान ने ज्यादा सावधानी बरती और रोटी को दोनों ओर से बराबर सेकाई की I वह रोटी बहुत हीं अच्छी , मुलायम और गेहुआं बनी जो भारत देश के निवासी हैं I एक परिपक्व मनोमस्तिष्क के मालिक , सद्भाव , समभाव , लोकतांत्रिक और सेक्युलर I डॉ राधाकृष्णन का मानना था कि व्यक्ति निर्माण और चरित्र निर्माण में शिक्षक का विशेष योगदान होता है I
एक वार डॉ अब्दुल कलाम आज़ाद से किसी पत्रकार ने पूछा " आप देश के महान हस्तियों में एक हैं I राष्ट्रपति , मिसाइलमैन ,वैज्ञानिक और भारत रत्न प्राप्त कर विशिष्टता के चरमोत्कर्ष पर पहुँच चुके हैं , लेकिन जब ये प्रश्न पूछा जाय कि जनता आपको किस नाम से जाने तो आपका क्या जबाब होगा ? " जानते हैं तब उनहोंने क्या कहा " मैं एक शिक्षक कहलाना ज्यादा पसंद करूंगा I " पत्रकार इसका कारण जानना चाहा तो उनहोंने कहा " गुरु दो शब्दों का एक छोटा सा शब्द है लेकिन इससे बड़ा इस दुनिया में कुछ भी नहीं I
लघु का विपरीतार्थक शब्द है गुरु , जिसका विस्तार अनंत तक फैला है क्षितिज की तरह। " किसी देश को अगर आप भ्रष्टाचार मुक्त और विकसित देश बनाना चाहते हैं तो मेरा मानना है कि समाज के तीन लोग इसे पूरा कर सकते हैं - माता , पिता और गुरु । कबीर ने भी कहा है - " गुरु गोविन्द खड़े दोउ , काके लागि पाँव , बलिहारी गुरु आपनो , गोविन्द दियो बताय ।। " प्रथम गुरु माँ का ममतामयी आँचल , दूसरा गुरु पिता का स्नेह और तीसरा गुरु नैतिकता , संस्कार और शिक्षा प्रदान करने वाले शिक्षक माने जाते हैं।
समय क्षणभर विश्राम किये बिना अपनी गति से हर पल गतिमान है इसलिए मेरा यह कर्तव्य है कि समय की महत्ता को समझते हुए इन शब्दों के साथ अपनी वाणी को विश्राम देना चाहूँगा कि हे गुरुवर ,
"आपके ऋण से हम उऋण हो सकते नहीं , शब्दों में अनुशंसा कर ज़ज़्ज़बात कह सकते नहीं। इसलिए हे गुरुवर
" मेरे सिर पर पुनः आशीषमय हाथ दीजिये | दीपक जले सूरज जैसा , ऐसा हमें प्रकाश दीजिये।|
जय हिन्द , जय गुरुदेव !!!!!!
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